अफसरों के खिलाफ जांच से पहले मंजूरी क्यों हो जरूरी!
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ऐसा लगता है जैसे सारा देश कतार में खड़ा हो गया हो। नोट बदलने के लिए, एटीएम से पैसे निकालने के लिए या डिपॉजिट करने के लिए। काले धन और भ्रष्टाचार पर इस बड़ी लड़ाई में पूरा देश साथ में आ गया है। परेशानी है तकलीफ है। लेकिन ये कड़वी दवाई सब निगल गए है क्योंकि इससे भविष्य सुनहरा होगा। कम से कम उम्मीद तो यही है। लेकिन आज आवाज अड्डा में हम एक सवाल पूछना चाहते है। 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट रद्द किए जाने से प्रभावित देशवासियों कि तरफ से कि अगर हम सब साथ मिलकर भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ रहे है। तो एसे में सरकारी कर्मचारियों को भ्रष्टाचार की कार्रवाई से कवच देने की तैयारी क्यों चल रही है। ये एसी खबर है जो अखबार के पन्नों में कही गायब हो गयी है।
दरअसल केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र सिंह ने एलान किया है कि भ्रष्टाचार अधिनियम के संशोधन विधेयक की रोकथाम में ऐसे प्रावधान किए जाएंगे कि किसी भी जांच एजेंसी को किसी भी सरकारी कर्मचारी की जांच करने से पहले मंजूरी लेनी होगी। मंजूरी देंगे सक्षम प्राधिकारी यानी सही अधिकारी। इसके बाद अगर कोई भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी रिश्वत ले तो उसकी शिकायत करना और जांच करवाना और मुश्किल हो जाएगा। हम पूछ रहे है कि जब पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का खामियाजा भुगत रहा है। कैश के बिना काम चला रहा है।
बी कतारों में खड़ा हुआ। ऐसे समय पर क्या सरकार को भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ एक्शन आसान करना चाहिए था या मुश्किल। क्या सरकारी तंत्र को दिया जाने वाला घूस काले धन का बड़ा स्त्रोत नही है। क्या इससे काले धन के खिलाफ लड़ाई कमजोर नही होगी।
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